ओम साईं राम. 'ॐ साईं राम, बोलो जय साईं राम..' 2018-09-30

ओम साईं राम Rating: 5,7/10 1421 reviews

ॐ साईं राम

ओम साईं राम

सपटणेकर दर्शनों के लिए आगे बढ़ , परन्तु उनका पूर्वोक्त वचनों से ही स्वागत हुआ कि बाहर निकल जाओ । इस बार वे बहुत धैर्य और नम्रता धारण करके आये थे । उन्होंने कहा कि पिछले कर्मों के कारण ही बाबा मुझसे अप्रसन्न है और उन्होंने अपना चरित्र सुधारने का निश्चय कर लिया और बाबा से एकान्त में भेंट करके अपने पिछले कर्मों की क्षमा माँगने का निश्चय किया । उन्होंने वैसा ही किया भी और अब जब उन्होंने अपना मस्तक उनके श्रीचरमणों पर रखा तो बाबा ने उन्हें आशीर्वाद दिया । अब सपटणेकर उनके चरण दबाते हुए बैठे ही थे कि इतने में एक गड़ेरिन आई और बाबा की कमर दबाने लगी । तब वे सदैव की भाँति एक बनिये की कहानी सुनाने लगे । जब उन्होंने उसके जीवन के अनेकों परिवर्तन तथा उसके इकलौते पुत्र की मृत्यु का हाल सुनाया तो सपटणेकर को अत्यन्त आश्चर्य हुआ कि जो कथा वे सुना रहे है , वह तो मेरी ही है । उन्हें बड़ा अचम्भा हुआ कि उनको मेरे जीवन की प्रत्येक बात का पता कैसे चल गया । अब उन्हं विदित हो गया कि बाबा अन्तर्यामी है और सबके हृदय का पूरा-पूरा रहस्य जानते है । यह विचार उनके मन में आया ही था कि गड़ेरिन से वार्तालाप चालू रखते हुए बाबा सपटणेकर की ओर संकेत कर कहने लगे कि यह भला आदमी मुझ पर दोषारोपण करता है कि मैंने ही इसके पुत्र को मार डाला है । क्या मैं लोगों के बच्चों के प्राण-हरण करता हूँ । फिर ये महाशय मसजिद में आकर अब क्यों चीख-पुकार मचाते है । अब मैं एक काम करुँगा । अब मैं उसी बालक को फिर से इनकी पत्नी के गर्भ में ला दूँगा । - ऐसा कहकर बाबा ने अपना वरद हस्त सपटणेकर के सिर पर रखा और उसे सान्त्वना देते हुए काह कि ये चरण अधिक पुरातन तथा पवित्र है । जब तुम चिंता से मुक्त होकर मुझ पर पूरा विश्वास करोगे , तभी तुम्हें अपने ध्येय की प्राप्ति हो जायेगी । सपटणेकर का हृदय गदरगद हो उठा । तब अश्रुधारा से उनके चरण धोकर वे अपने निवासस्थान पर लौट आये और फिर पूजन की तैयारी कर नैवेघ आदि लेकर वे सपत्नीक मसजिद में आये । वे इसी प्रकार नित्य नैवेघ चढ़ाते और बाबा से प्रसाद ग्रहण करते रहे । मसजिद में अपार भीड़ होते हुए भी वे वहाँ जाकर उन्हें बार-बार नमस्कार करते थे । एक दूसरे से सिर टकराते देखकर बाब ने उनसे कहा कि प्रेम तथा श्रद्घा द्घारा किया हुआ एक ही नमस्कार मुझे पर्याप्त है । उसी रात्रि को उन्हें चावड़ी का उत्सव देखने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ और उन्हें बाबा ने पांडुरंग के रुप में दर्शन दिये । जब वे दूसरे दिन वहाँ से प्रस्थान करने लगे तो उन्होंने विचार किया कि पहले दक्षिणा में बाबा को एक रुपया दूँगा । यदि उन्होंने और माँगे तो अस्वीकार करने के बजाय एक रुपया और भेंट में चढ़ा दूँगा । फिर भी यात्रा के लिये शेष द्रव्यराशि पर्याप्त होगी । जब उन्होंने मसजिद में जाकर बाबा को एक रुपया दक्षिणा दी तो बाबा ने भी उनकी इच्छा जानकर एक रुपया उनसे और माँगा । जब सपटणेकर ने उसे सहर्ष दे दिया तो बाबा ने भी उन्हें आर्शीवाद देकर कहाकि यह श्रीफल ले जाओ और इसे अपनी पत्नी की गोद में रखकर निश्चिंत होकर घर जाओं । उन्होंने वैसा ही किया और एक वर्ष के पश्चात ही उन्हें एक पुत्र प्राप्त हुआ । आठ मास का शिशु लेकर वह दम्पति फिर शिरडी को आये और बाबा के चरणों पर बालक को रखकर फिर इस प्रकार प्रर्थना करने लगे कि हे श्री साईनाथ । आपके ऋण हम किस प्रकार चुका सकेंगें । आपके श्री चरणों में हमारा बार-बार प्रणाम है । हम दीनों पर आप सदैव कृपा करते रहियेगा , क्योंकि हमारे मन में सोते-जागते हर समय न जाने क्या-क्या संकल्प-विकल्प उठा करते है । आपके भजन में ही हमारा मन मग्न हो जाये , ऐसा आर्शीवाद दीजिये ।. जैसे गीतों से गुरुवार को बच्चों ने मदर्स डे पर मां की ममता और महत्ता का भावपूर्ण वर्णन किया। इस दौरान म्यूजिकल चेयर, पेन पेपर गेम तथा वन मिनट शो आयोजित किया गया जिसमें माताओं ने हिस्सा लिया। बच्चों ने अपनी मां को उपहार दिए। मदर्स डे पर लायंस स्कूल के प्राइमरी विंग की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। मैने मां को देखा है. और कानूनी सलाहकार Solicitor की परीक्षाएँ पास की और फिर वे सरकारी सालिसिटर फर्म-मेसर्स लिटिल एण्ड कम्पनी में कार्य करने लगे । इसके पश्चात उन्होंने स्वतः की एक साँलिसिटर फर्म चालू कर दी । सन् 1909 के पहले तो बाबा की कीर्ति उनके कानों तक नहीं पहुँची थी , परन्तु इसके पश्चात् वे शीघ्र ही बाबा के परम भक्त बन गये । जब वे लोनावला में निवास कर रहे थे तो उनकी अचानक भेंट अपने पुराने मित्र नानासाहेब चाँदोरकर से हुई । दोनों ही इधर-उधर की चर्चाओं में समय बिताते थे । काकासाहेब ने उन्हें बताया कि जब वे लन्दन में थे तो रेलगाड़ी पर चढ़ते समय कैसे उनका पैर फिसला तथा कैसे उसमें चोट आई , इसका पूर्ण विवरण सुनाया । काकासाहेब ने आगे कहा कि मैंने सैकड़ो उपचार किये , परन्तु कोई लाभ न हुआ । नानासाहेब ने उनसे कहा कि यदि तुम इस लँगड़ेपन तथा कष्ट से मुक्त होना चाहते हो तो मेरे सदगुरु श्री साईबाबा की शरण में जाओ । उन्होंने बाबा का पूरा पता बताकर उनके कथन को दोहराया कि मैं अपने भक्त को सात समुद्रों के पास से भी उसी प्रकार खींच लूँगा , जिस प्रकार कि एक चिड़िया को जिसका पैर रस्सी से बँधा हो , खींच कर अपने पास लाया जाता है । उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि तुम बाबा के निजी जन न होगे तो तुम्हें उनके प्रति आकर्षण भी न होगा और न ही उनके दर्शन प्राप्त होंगे । काकासाहेब को ये बातें सुनकर बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने कहा , वे शिरडी जाकर बाबा से प्रार्थना करेंगे कि शारीरिक लँगड़ेपन के बदले उनके चंचल मन को अपंग बनाकर परमानन्द की प्राप्त करा दे । कुछ दिनों के पश्चात् ही बम्बई विधान सभा Legislative Assembly के चुनाव में मत प्राप्त करने के सम्बन्ध में काकासाहेब दीक्षित अहमदनगर गये और सरदार काकासाहेब मिरीकर के यहां ठहरे । श्री. एनके पांडेय ने पुरस्कृत किया। कक्षा पांच की छात्रा विधि बंसल ने मदर्स डे पर मां की ममता को अपनी अभिव्यक्ति के माध्यम से व्यक्त किया। संचालन कक्षा पांच की रिद्घि अग्रवाल, निष्ठा शांतुवाला और अलिना अंसारी ने किया गया। कार्यक्रम का आयोजन दिव्या अग्रवाल ने किया। अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी , और के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।. शेवड़े का है और वे परीक्षा में बैठने के अयोग्य है । जब सब मित्रों ने मिलकर उनका उपहास किया , तब शेवड़े ने कहा कि यघपि मेरा अध्ययन अपूर्ण है तो भी मैं परीक्षा में अवश्य उत्तीर्ण हो जाऊँगा । मेरे साईबाबा ही सबको सफलता देने वाले है । श्री. और मैं किसी अँधेरे कोने में बैठकर,.

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चारों तरफ गूंजा ओम साईं राम

ओम साईं राम

शनिवार को हवन, महाआरती तथा भंडारा का आयोजन किया जायेगा. उनकी असीम कृपा से मैंने ये ब्लॉग बनाया है. श्रद्धालु हाथ में साईं निशान लेकर झूम रहे थे. साईं बाबा की पालकी भ्रमण व महोत्सव में अध्यक्ष प्रदीप यादव, सचिव अरुण गुप्ता, पूर्व डिप्टी मेयर प्रीति शेखर, उत्तम साह, इंद्रजीत कुमार, मीडिया प्रभारी मनोज यादव, मंदिर सेविका विमला देवी, सोनी भारती, आशा गुप्ता, अमरजीत राय, विष्णु अग्रवाल, सुधीर पांडेय, बिट्टू राय, प्रियम आदि का विशेष योगदान रहा. आगे-आगे साईं बाबा की मनोरम झांकी की गाड़ी जा रही थी.

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ॐ साईं राम

ओम साईं राम

I have included old and rare photos of him, his belongings, his devotees, his birthplace and many more. रास्ते में कई स्थानों पर शरबत तथा स्वागत की व्यवस्था की गयी थी. पार नवादा गया रोड से प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था के साथ शोभायात्रा में लोग नाचते-गाते हुए बाजार के विभिन्न मार्गों से होकर गुजरी. पीछे-पीछे बैंड-बाजों, डीजे व अखंड-संकीर्तन पार्टी के साथ सैकड़ों श्रद्धालु साईं बाबा के भजन गाते हुए नाच रहे थे. मधू, सोनी बरसर, महेश पांडे, दयानंद त्यागी, विनय व प्राचार्य पारमिता ने किया। इस अवसर पर आनंद भारद्वाज, नीलम त्रिपाठी, नरेंद्र आदिकारी, अनीता यादव, कमलेश मौजूद रहे। गन्नौर. श्री शिरडी साईं पंच मंदिर पार नवादा के पांचवें वार्षिकोत्सव समारोह के अवसर पर शुक्रवार की सुबह सबसे पहले साईं बाबा के विधि विधान से पूजन के बाद पालकी को सजाया गया. एनके पांडेय ने जीवन में मां की महत्ता, उनका त्याग और अपने परिवार के प्रति समर्पण भावना का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि बच्चे को मां ही पहली शिक्षा से लेकर जीवन पर्यंत अच्छे बुरे की शिक्षा देती है। मां के महत्व को कभी भी कम नही आंका जा सकता है। उप प्रधानाचार्या रितु भारद्वाज ने मां के महत्ता को बताया। इस दौरान मां सुमन मोरे, मोनिका जैन, लता गुप्ता, योगिता यादव, अर्चना सोनी, कनि पांडेय, मनिका अग्रवाल ने पेन पेपर गेम में प्रतिभाग किया। इसमें सफल माताओं को प्रधानाचार्य डा.

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Ganaur

ओम साईं राम

देव ने उसे रचकर प्रस्तुत किया । पुस्तक के प्रारम्भ में ही विषयसूची देने तथा प्रत्येक अध्याय में विषय का संकेत शीर्षक स्वरुप लिखना ही आधुनिक प्रथा है , इसलिये यहाँ अनुक्रमाणिका नहीं दी जा रही है । अतः इस अध्याय को उपसंहार समझना ही उपयुक्त होगा । अभाग्यवश हेमा़डपंत उस समय तक जीवित न रहे कि वे अपने लिखे हुए इस अध्याय की प्रति में संशोधन करके उसे छपने योग्य बनाते । हे साई , मैं आपकी चरण वन्दना कर आपसे शरण की याचना करता हूँ , क्योकि आप ही इस अखिल विश्व के एकमात्र आधार है । यदि ऐसी ही धारणा लेकर हम उनका भजन-पूजन करें तो यह निश्चित है कि हमारी समस्त इच्छाएं शीघ्र ही पूर्ण होंगी और हमें अपने परम लक्ष्य की प्राप्ति हो जायेगी । आज निन्दित विचारों के तट पर माया-मोह के झंझावात से धैर्य रुपी वृक्ष की जड़ें उखड़ गई है । अहंकार रुपी वायु की प्रबलता से हृदय रुपी समुद्र में तूफान उठ खड़ा हुआ है , जिसमें क्रोध और घृणा रुपी घड़ियाल तैरते है और अहंभाव एवं सन्देह रुपी नाना संकल्प-विकल्पों की संतत भँवरों में निन्दा , घृणा और ईर्ष्या रुपी अगणित मछलियाँ विहार कर रही है । यघपि यह समुद्र इतना भयानक है तो भी हमारे सदगुरु साई महाराज उसमें अगस्त्य स्वरुप ही है । इसलिये भक्तों को किंचितमात्र भी भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है । हमारे सदगुरु तो जहाज है और वे हमें कुशलतापूर्वक इस भयानक भव-समुद्र से पार उतार देंगे । श्री सच्चिदानंद साई महाराज को साष्टांग नमस्कार करके उनके चरण पकड़ कर हम सब भक्तों के कल्याणार्थ उनसे प्रार्थना करते है कि हे साई । हमारे मन की चंचलता और वासनाओं को दूर करो । हे प्रभु । तुम्हारे श्रीचरणों के अतिरिक्त हममें किसी अन्य वस्तु की लालसा न रहे । तुम्हारा यह चरित्र घर-घर पहुँचे और इसका नित्य पठन-पाठन हो और जो भक्त इसका प्रेमपूर्वक अध्ययन करें , उनके समस्त संकट दूर हो । अब इस पुस्तक के अध्ययन से प्राप्त होने वाले फल के सम्बन्ध में कुछ शब्द लिखूँगा । इस ग्रन्थ के पठन-पठन से मनोवांछित फल की प्राप्ति होगी । पवित्र गोदावरी नदी में स्नान कर , शिरडी के समाधि मन्दिर में श्री साईबाबा की समाधि के दर्शन कर लेने के पश्चात इस ग्रन्थ का पठन-पाठन या श्रवण प्रारम्भ करोगे तो तुम्हारी तिगुनी आपत्तियाँ भी दूर हो जायेंगी । समय-समय पर श्री साईबाबा की कथा-वार्ता करते रहने से तुम्हें आध्यात्मिक जगत् के प्रति अज्ञात रुप से अभिरुचि हो जायेगी और यदि तुम इस प्रकार नियम तथा प्रेमपूर्वक अभ्यास करते रहे तो तुम्हारे समस्त पाप अवश्य नष्ट हो जायेंगें । यदि सचमुच ही तुम आवागमन से मुक्ति चाहते हो तो तुम्हें साई कथाओं का नित्य पठन-पाठन , स्मरण और उनके चरणों में प्रगाढ़ प्रीति रखनी चाहिये । साई कथारुपी समुद्र का मंथन कर ुसमें से प्राप्त रत्नों का दूसरों को वितरण करो , जिससे तुम्हें नित्य नूतन आनन्द का अनुभव होगा और श्रोतागण अधःपतन से बच जायेंगे । यदि भक्तगण अनन्य भाव से उनकी शरण आयें तो उनका ममत्व नष्ट होकर बाबा से अभिन्नता प्राप्त हो जायेगी , जैसे कि नदी समुद्र में मिल जाती है । यदि तुम तीन अवस्थाओं अर्थात्- जागृति , स्वप्न और निद्रा में से किसी एक में भी साई-चिन्तन में लीन हो जाओ तो तुम्हारा सांसारिक चक्र से छुटकारा हो जायेगा । स्नान कर प्रेम और श्रद्घयुक्त होकर जो इस ग्रन्थ का एक सप्ताह में पठन समाप्त करेंगे , उनके सारे कष्ट दूर हो जायेंगे या जो इसका नित्य पठन या श्रवण करेंगे , उन्हें सब भयों से तुरन्त छुटकारा मिल जायेगा । इसके अध्ययन से हर एक को अपनी श्रद्घा और भक्ति के अनुसार फल मिलेगा । परन्तु इन दोनों के अभाव में किसी भी फल की प्राप्ति होना संभव नहीं है । यदि तुम इस ग्रन्थ का आदरपूर्वक पठन करोगे तो श्री साई प्रसन्न होकर तुम्हें अज्ञान और दरिद्रता के पाश से मुक्त कर , ज्ञान , धन और समृद्घि प्रदान करेंगे । यदि एकाग्रचित होकर नित्य एक अध्याय ही पढ़ोगे तो तुम्हें अपरिमित सुख की प्राप्ति होगी । इस ग्रन्थ को अपने घर पर गुरु-पूर्णिमा , गोकुल अष्टमी , रामनवमी , विजयादशमी और दीपावली के दिन अवश्य पढ़ना चाहिये । यदि ध्यानपूर्वक तुम केवल इसी ग्रन्थ का अध्ययन करते रहोगे तो तुम्हें सुख और सन्तोष प्राप्त होगा और सदैव श्री साई चरणारविंदो का स्मरण बना रहेगा और इस प्रकार तुम भवसागर से सहज ही पार हो जाओगे । इसके अध्ययन से रोगियों को स्वास्थ्य , निर्धनों को धन , दुःखित और पीड़ितों को सम्पन्नता मिलेगी तथा मन के समस्त विकार दूर होकर मानसिक शान्ति प्राप्त होगी । मेरे प्रिय भक्त और श्रोतागण । आपको प्रणाम करते हुए मेरा आपसे एक विशेष निवेदन है कि जिनकी कथा आपने इतने दिनों और महीनों से सुनी है , उनके कलिमलहारी और मनोहर चरणों को कभी विस्मृत न होने दें । जिस उत्साह , श्रद्गा और लगन के साथ आप इन कथाओं का पठन या श्रवण करेंगे , श्री साईबाबा वैसे ही सेवा करने की बुद्घि हमें प्रदान करेंगे । लेखक और पाठक इस कार्य में परस्पर सहयोग देकर सुखी होवें । उन श्री साई महाराज की जय हो , जो बक्तों के जीवनाधार एवं सदगुरु है । वे गीताधर्म का उपदेश देकर हमें शक्ति प्रदान कर रहे है । हे साई , कृपादृष्टि से देखकर हमें आशीष दो । जैसे मलयगिरि में होनेवाला चन्दनवृक्ष समस्त तापों का हरण कर लेता है अथवा जिस प्रकार बादल जलवृष्टि कर लोगों को शीतलता और आनन्द पहुँचाते है या जैसे वसन्त में खिले फूल ईश्वरपूजन के काम आते है , इसी प्रकार श्री साईबाबा की कथाएँ पाठकों तथा श्रोताओं को धैर्य एवं सान्त्वना देती है । जो कथा कहते या श्रवण करते है , वे दोनों ही धन्य है , क्योंकि उनके कहने से मुख तथा श्रवण से कान पवित्र हो जाते है । श्री हरि सीताराम उपनाम काकासाहेब दीक्षित सन् 1864 में वड़नगर के नागर ब्राहमण कुल में खणडवा में पैदा हुए थे । उनकी प्राथमिक शिक्षा खण्डवा और हिंगणघाट में हुई । माध्यमिक सिक्षा नागुर में उच्च श्रेणी में प्राप्त कने के बाद उन्होंने पहले विल्सन तथा बाद में एलफिन्स्टन काँलेज में अध्ययन किया । सन् 1883 में उन्होंने ग्रेज्युएट की डिग्री लेकर कानूनी L. मुझे इनाम ,सम्मान , पुरस्कार से अनुग्रहित करती है. साईं बाबा की पालकी कचहरी चौक, तिलकामांझी चौक, घुरन पीर चौक, आदमपुर चौक, दीपनगर चौक, बूढ़ानाथ चौक, नया बाजार, कोतवाली चौक, लहेरी टोला, स्टेशन चौक, सूजागंज, खलीफाबाग चौक होते हुए पुन: संकट मोचक दरबार में पूरी हुई. No one needs any introduction of him. सपटणेकर को यह सुनकर आश्चर्य हुआ और उन्होंने श्री. नवादा नगर : ओम साईं राम के जयकारे के साथ शहर में बैंड-बाजे व डीजे से साथ साईं पालकी शोभायात्रा निकाली गयी. गन्नौर बड़ी स्थित अपोलो इंटरनेशनल स्कूल के परिसर में असत्य पर सत्य की जीत का पर्व मनाया गया। प्राइमरी कक्षा के बच्चें राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान, रावण की वेशभूषा में रामायण का मंचन कर दर्शकों से जमकर तालियां बटोरने का काम किया। माता-पिता के प्रति सम्मान दिखाते हुए बच्चों ने ये तो सच है कि भगवान है.

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Mujhe Maaf Karna Om Sai Ram

ओम साईं राम

आयोजन से जुड़े शिवनारायण प्रसाद, अशोक कुमार सिन्हा, बलवीर चंद्र,रोहित, राजू कुमार, शशि भूषण, शरद माथुर, डबलू आदि सक्रियता के साथ जुड़े दिखे. सुरखीकल साईं मंडली की ओर से जल, टॉफी आदि का वितरण किया गया. लोगों ने श्रद्धा व उत्साह के साथ गरमी की परवाह किये बिना सैकड़ों की संख्या में माथे पर केसरिया पट्टी लगाये शोभायात्रा में शामिल हुए. Please click there to see all the photos. .

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मुझे माफ करना ओम साई राम...

ओम साईं राम

गीत के साथ कार्यक्रम शुरू हुआ। बच्चों ने मदर्स डे पर अपनी माताओं को हाथों से बनाए उपहार दिए। मदर्स डे पर प्रधानाचार्य डा. गीत के साथ कार्यक्रम शुरू हुआ। बच्चों ने मदर्स डे पर अपनी माताओं को हाथों से बनाए उपहार दिए। मदर्स डे पर प्रधानाचार्य डा. मेरा ये ब्लॉग ; श्री साईंबाबा को मेरी छोटी सी भक्ति भरी दक्षिणा है और जब कभी भी मेरी ज़िन्दगी में कोई भी परेशानी हो , मैंने सिर्फ बाबा को याद किया , तब बाबा ने ही सहारा दिया. जगह-जगह हुआ स्वागत : शहर के विभिन्न चौक-चौराहों पर साईं बाबा की पालकी का भव्य स्वागत किया गया. Shri Saibaba of shirdi is a true saint of our times.

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Best Of Sai Bhajan 2018 Om Sai Ram Vinay Anand Music World

ओम साईं राम

सपटणेकर को अपने मिक्ष के ऐसे विश्वास पर हँसी आ गई और साथ ही साथ श्री साईबाबा का भी उन्होंन उपहास किया । भविष्य में जब शेवड़े दोनों परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो गये , तब सपटणेकर को यह जानकर बड़ा आश्चर्य हुआ । श्री. देर तक शहर में शोभायात्रा घूमने के बाद मंदिर में पहुंच कर समाप्त हुई, जहां शोभायात्रा में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद के रूप में भोजन का वितरण किया गया. इनमें महिला श्रद्धालुओं की संख्या भी कम नहीं थी. बालाराम धुरन्धर प्रभु जाति के एक सज्जन थे । वे बम्बई के उच्च न्यायालय में एडवोकेट थे तथा किसी समय शासकीय विधि विघालय Govt. बालासाहेब मिरीकर जो कि कोपरगाँव के मामलतदार तथा काकासाहेब मिरीकर के सुपत्र थे , वे भी इसी समय अश्वप्रदर्शनी देखने के हेतु अहमदनगर पधारे थे । चुनाव का कार्य समाप्त होने के पश्चात काकासाहेब दीक्षित शिरडी जाना चाहते थे । यहाँ पिता और पुत्र दोनों ही घर में विचार कर रहे थे कि काकासाहेब के साथ भेजने के लिये कौन सा व्यक्ति उपयुक्त होगा और दूसरी ओर बाबा अलग ही ढंग से उन्हें अपने पास बुलाने का प्रबन्ध कर रहे थे । शामा के पास एक तार आया कि उनकी सास की हालत अधिक शोचनीय है और उन्हें देखने को वे शीघ्र ही अहमदनगर को आये । बाबा से अनुमति प्राप्त कर शामा ने वहां जाकर अपनी सास को देखा , जिनकी स्थिति में अब पर्याप्त सुधार हो चुका था । प्रदर्शनी को जाते समय नानासाहेब पानसे तथा अप्पासाहेब दीक्षित से भेंट करने तथा उन्हें अपने साथ शिरडी ले जाने को कहा । उन्होंने शामा के आगमन की सूचना काकासाहेब दीक्षित और मिरीकर को भी दे दी । सन्ध्या समय शामा मिरीकर के घर आये । मिरीकर ने शामा का काकासाहेब दीक्षित से परिचय कर दिया और फिर ऐसा निश्चित हुआ कि काकासाहेब दीक्षित उनके साथ रात 10 बजे वाली गाड़ी से कोपरगाँव को रवाना हो जाये । इस निश्चय के बाद ही एक विचित्र घटना घटी । बालासाहेब मिरीकर ने बाबा के एक बड़े चित्र पर से परदा हटाकर काकासाहेब दीक्षित को उनके दर्शन कराये तो उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिनके दर्शनार्थ मैं शिरडी जाने वाला हूँ , वे ही इस चित्र के रुप में मेरे स्वागत हेतु यहाँ विराजमान है । तब अत्यन्त द्रवित होकर वे बाबा की वन्दना करने लगे । यह चित्र मेघा का था और काँच लगाने के लिये मिरीकर के पास आया था । दूसरा काँच लगवा कर उसे काकासाहेब दीक्षित तथा शामा के हाथ वापस शिरडी भेजने का प्रबन्ध किया गया । 10 बजे से पहले ही स्टेशन पर पहुँचकर उन्होंने द्घितीय श्रेणी का टिकट ले लिया । जब गाड़ी स्टेशन पर आई तो द्घितीय श्रेणी का डिब्बा खचाखच भरा हुआ था । उसमें बैठने को तिलमात्र भी स्थान न था । भाग्यवश गार्डसाहेब काकासाहेब दीक्षित की पहिचान के निकल आये और उन्होंने इन दोनों को प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बैठा दिया । इस प्रकार सुविधापू 4 वक यात्रा करते हुए वे कोपरगाँव स्टेशन पर उतरे । स्टेशन पर ही शिरडी को जाने वाले नानासाहेब चाँदोरकर को देखकर उनके हर्ष का पारावार न रहा । शिरडी पहुँचकर उन्होंने मसजिद में जाकर बाबा के दर्शन किये । तब बाबा कहने लगे कि मैं बड़ी देर से तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर राह था । शामा को मैंने ही तुम्हें लाने के लिये भेज दिया था । इसके पश्चात् काकासाहेब ने अनेक वर्ष बाबा की संगति में व्यतीत किये । उन्होंने शिरडी में एक वाड़ा दीक्षित वाडा बनवाया , जो उनका प्रायः स्थायी घर हो गया । उन्हें बाबा से जो अनुभव प्राप्त हुए , वे सब स्थानाभाव के कारण यहाँ नहीं दिये जा रहे है । पाठकों से प्रार्थना है कि वे श्री साईलीला पत्रिका के विशेषांक काकासाहेब दीक्षित भाग 12 के अंक 6-9 तक देखे । उनके केवल एक दो अनुभव लिखकर हम यह कथा समाप्त करेंगे । बाबा ने उन्हें आश्वासन दिया था कि अनत समय आने पर बाबा उन्हें विमान में ले जायेंगे , जो सत्य निकला । तारीख 5 जुलाई , 1926 को वे हेमाडपंत के साथ रेल से यात्रा कर रहे थे । दोनों में साईबाबा के विषय में बाते हो रही थी । वे श्री साईबाबा के ध्यान में अधिक तल्लीन हो गये , तभी अचानक उनकी गर्दन हेमाडपंत के कन्धे से जा लगी । और उन्होंने बिना किसी कष्ट तथा घबराहट के अपनी अंतिम श्वास छो़ड़ दी । अब हम द्घितीय कथा पर आते है , जिससे स्पष्ट होता है कि सन्त परस्पर एक दूसरे को किस प्रकार भ्रतृवत् प्रेम किया करते है । एक बार श्री वासुदेवानन्द सरस्वती , जो श्री. शिर्डी के साईबाबा, भगवान अनेक रूपों में एक सच्चे स्वरुप है.

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ॐ साईं राम

ओम साईं राम

आदमपुर चौक पर नर सेवा, नारायण सेवा की ओर से भक्तों व राहगीरों को शरबत, पानी, फल व अन्य प्रकार का प्रसाद वितरण किया गया. ! During one of my visits to shirdi , I just thought ,can I do some research on him, his devotees etc. पवित्रता के साथ मंत्रोच्चारण करते हुए पालकी पर साईं प्रतिमा को विराजमान करके फूलों से सजी पालकी को मंदिर से निकाला गया. उमड़ा साईं भक्तों का सैलाब : श्रद्धालु दोपहर दो बजे एक हाथी, 12 घुड़सवार, गाजे-बाजे व लग्जरी गाड़ियों के साथ साईं बाबा की पालकी नगर भ्रमण के लिए निकाली गयी. Law School और बम्बई के प्राचार्य Principal भी थे । उनका सम्पूर्ण कुटुम्ब सात्विक तथा धार्मिक था । श्री बालाराम ने अपनी जाति की योग्य सेवा की और इस सम्बन्ध में एक पुस्तक भी प्रकाशित कराई । इसके पश्चात् उनका ध्यान आध्यात्मिक और धार्मिक विषयों पर गया । उन्होंने ध्यानपूर्वक गीता , उसकी टीका ज्ञानेश्वरी तथा अन्य दार्शनिक ग्रन्थों पर अध्ययन किया । वे पंढरपुर के भगवान विठोबा के परम भक्त ते । सन् 1912 में उन्हें श्री साईबाबा के दर्शनों का लाभ हुआ । छः मास पूर्व उनके भाई बाबुलजी और वामनराव ने शिरडी आकर बाबा के दर्शन किये थे और उन्होंने घर लौटकर अपने मधुर अनुभव भी श्री. मेरा उन्हें शत शत प्रणाम और चरणवंदना.

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मुझे माफ करना ओम साई राम...

ओम साईं राम

I visited shirdi so many times, read many books on him , visited websites , met old people and gathered a lot of information. इसमें अध्यक्ष दिनेश मंडल, भाजपा नगर अध्यक्ष अभय घोष सोनू, श्वेता सिंह, बबलू चौधरी, बूलो मंडल, विनोद सिंह, गणेश आदि शामिल थे. बड़ी संख्या में महिलाएं व बच्चे भी उत्साह के साथ शोभायात्रा में शामिल थे. शेवड़े से पूछा कि ये साईबाबा कौन है , जिनका तुम इतना गुणगान कर रहे हो । उन्होंने उत्तर दिया कि वे एक फकीर है , जो शिरडी अहमदनगर की एक मसजिद में निवास करते है । वे महान सत्पुरुष है । ऐसे अन्य संत भी हो सकते है , परन्तु वे उनसे अद्गितीय है । जब तक पूर्व जन्म के शुभ संस्कार संचित न हो , तब तक उनसे भेंट होना दुर्लभ है । मेरी तो उन पर पूर्ण श्रद्घा है । उनके श्रीमुख से निकले वचन कभी असत्य नहीं होते । उन्होंने ही मुझे विश्वास दिलाया है कि मैं अगले वर्ष परीक्षा में अवश्य उत्तीर्ण हो जाऊँगा । मेरा भी अटल विश्वास है कि मैं उनकी कृपा से परीक्षा में अवश्य ही सफलता पाऊँगा । श्री. स्पटणेकर वकालत का अध्ययन कर रहे थे । एक दिन उनकी अपने सहपाठी श्री.

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